(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.224. अध्यायः 224
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
परमेश्वरेण पार्वतींप्रति मर्त्यामर्त्यानां शरीरभेदाभेदेन कर्मफलभोगोक्तिः॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

उमोवाच।

भगवन्देवदेवेश लोकपालनमस्कृत।
प्रसादात्ते महादेव श्रुता मे कर्मणां गतिः॥ 13-224-1(90222)
सङ्गृहीतं च तत्सर्वं तत्वतोऽमृतसंनिभम्।
कर्मणा ग्रथितं सर्वमिति वेद शुभाशुभम्॥ 13-224-2(90223)
गोवत्सवच्च जननीं निम्नं सलिलवत्तथा।
कर्तारं स्वकृतं कर्म नित्यं तदनुधावति॥ 13-224-3(90224)
कृतस्य कर्मणश्चेह नाशो नास्तीति निश्चयः।
अशुभस्य शुभस्यापि तदप्युपगतं मया॥ 13-224-4(90225)
भूय एव महादेव वरद प्रीतिवर्धन।
कर्मणां गतिमाश्रित्य संशयान्मोक्तुमर्हसि॥ 13-224-5(90226)
महेश्वर उवाच। 13-224-6x(7580)
यत्ते विवक्षितं देवि गुह्यमप्यसितेक्षणे।
तत्सर्वं निर्विशंका त्वं पृच्छ मां शुभलक्षणे॥ 13-224-6(90227)
उमोवाच। 13-224-7x(7581)
एवं व्यवस्थिते लोके कर्ममां वृषभध्वज।
कृत्वा तत्पुरुषः कर्म शुभं वा यदि वेतरत्॥ 13-224-7(90228)
कर्मणः सुकृतस्येह कदा भुङ्क्ते फलं पुनः।
इह वा प्रेत्य वा देव तन्मे शंसितुमर्हसि॥ 13-224-8(90229)
महेश्वर उवाच। 13-224-9x(7582)
स्थाने संशयितं देवि तद्धि गुह्यतमं नृषु।
त्वत्प्रियार्थं प्रवक्ष्यामि देवि गुह्यं शुभानने॥ 13-224-9(90230)
पूर्वदेहकृतं कर्म भुञ्जते तदिह प्रजाः।
इहैव यत्कृतं पुंसां तत्परत्र फलिष्यतै।
एषा व्यवस्थितिर्देवि मानुषेष्वेव दृश्यते॥ 13-224-10(90231)
देवानामसुराणां च अमरत्वात्तपोबलात्।
एकेनैव शरीरेण भुज्यते कर्मणां फलम्।
मानुषैर्न तथा देवि अन्तरं त्वेतदिष्यते॥ ॥ 13-224-11(90232)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चतुर्विंसत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 224 ॥


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